Saturday, January 26, 2013

kabhi kabhi zindgi


कभी कभी जिंदगी,
अनकही बातें हैं कई
कभी बैठो साथ मिलके
देखो शाम भी ये अब ढल ही गयी..

हलकी फुलकी सी ये किश्नागी
तेरी यादों कि महक ही है जो
नींदों को उड़ा कर करती है,
मासूम सी  नादानगी,

हो सकता है कह न पायें हम पर
मगर रात तो पूरी बाकी है अभी
कभी कभी जिंदगी
अनकही बातें हैं कई

थी कोई तो बात कि
याद है अभी तक भी
तेरा झगड़ना
और फिर रूठ कर खुद ही मान जाना
ऐसा लगता है बात थी वो कल कि ही

अभी वक़्त है होने में सुबह
जाने का क्यों लेते हो नाम अभी
कभी कभी जिंदगी
अनकही बातें हैं कई

साथ बैठो फिर कब क्या पता
सुबह भी अब तो आ ही गयी ...
कभी कभी  जिंदगी.....