Tuesday, July 10, 2012

An engineer.....

It was a routine day of my night shift when I got a call from network team that they need my computer for urgent resolution of a project related network issue. And dang!!!! I got few free hours but had nothing to do as I was alone in the office. and hence this creation came:

एक इंजीनियर

भोर के उजाले के साथ जब दिन निकलता है,
तब दुनिया को बदलने को कोई बिस्तर से उठता है|

सेहत की फिकर नहीं, ना ही चिंता खाने की,
लगी है धुन उसे तो बस कुछ कर दिखाने की|

कुछ नया करने को घर से जब निकलता है,
दफ्तर के काम को कर्त्तव्य समझ कर वो करता जाता है|

दफ्तर में भी आराम कहा उसने पाया है,
कभी सीनियर तो कभी कस्टमर, बस इसी में सर खपाया है|

रात के अंधियारे में लौटता है जो,
काम को ही पूजा मानता है वो|
फिर सोने से पहले करता है एक वादा,
की कल कर के कुछ है दुनिया को दिखाना|

अपनाया है जिसने नित्य नया करने की चुनौती को,
कहते हैं इंजीनियर  ऐसे ही कर्मयोगी को|

2 comments:

  1. are shabaash... night shift ne tujhe engineer hone ka matlab achhe se sikha diya...aur poet bhi bana diya :)
    Nice poem.

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  2. thank you sir ji... sab aapne hi sikhaya.. :)

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