It was a routine day of my night shift when I got a call from network team that they need my computer for urgent resolution of a project related network issue. And dang!!!! I got few free hours but had nothing to do as I was alone in the office. and hence this creation came:
अपनाया है जिसने नित्य नया करने की चुनौती को,
कहते हैं इंजीनियर ऐसे ही कर्मयोगी को|
एक इंजीनियर
भोर
के उजाले के
साथ जब दिन
निकलता है,
तब दुनिया को बदलने को कोई बिस्तर से उठता है|
सेहत की फिकर नहीं, ना ही चिंता खाने की,
लगी है धुन उसे तो बस कुछ कर दिखाने की|
कुछ नया करने को घर से जब निकलता है,
दफ्तर के काम को कर्त्तव्य समझ कर वो करता जाता है|
दफ्तर में भी आराम कहा उसने पाया है,
कभी सीनियर तो कभी कस्टमर, बस इसी में सर खपाया है|
रात के अंधियारे में लौटता है जो,
काम को ही पूजा मानता है वो|
तब दुनिया को बदलने को कोई बिस्तर से उठता है|
सेहत की फिकर नहीं, ना ही चिंता खाने की,
लगी है धुन उसे तो बस कुछ कर दिखाने की|
कुछ नया करने को घर से जब निकलता है,
दफ्तर के काम को कर्त्तव्य समझ कर वो करता जाता है|
दफ्तर में भी आराम कहा उसने पाया है,
कभी सीनियर तो कभी कस्टमर, बस इसी में सर खपाया है|
रात के अंधियारे में लौटता है जो,
काम को ही पूजा मानता है वो|
फिर सोने से
पहले करता है
एक वादा,
की कल कर के कुछ है दुनिया को दिखाना|
की कल कर के कुछ है दुनिया को दिखाना|
अपनाया है जिसने नित्य नया करने की चुनौती को,
कहते हैं इंजीनियर ऐसे ही कर्मयोगी को|
are shabaash... night shift ne tujhe engineer hone ka matlab achhe se sikha diya...aur poet bhi bana diya :)
ReplyDeleteNice poem.
thank you sir ji... sab aapne hi sikhaya.. :)
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